श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.49

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

एतदिष्टं प्रवृत्ताख्यं हुतं प्रहुतमेव च।

पूर्तं सुरालयारामकूपाजीव्यादिलक्षणम्॥ ४९

etadiṣṭaṃ pravṛttākhyaṃ hutaṃ prahutameva ca|

pūrtaṃ surālayārāmakūpājīvyādilakṣaṇam|| 49

अर्थ

श्येनयागादि हिंसामय कर्म, अग्‍निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुयाग, सोमयाग, वैश्‍वदेव, बलिहरण आदि द्रव्यमय कर्म ‘इष्ट’ कहलाते हैं और देवालय, बगीचा, कुआँ आदि बनवाना तथा प्याऊ आदि लगाना ‘पूर्त्तकर्म’ हैं। ये सभी प्रवृत्तिपरक कर्म हैं और सकामभावसे युक्त होनेपर अशान्तिके ही कारण बनते हैं॥ ४८-४९॥✎ 1618 1619

यह अर्थ श्लोक 48–49 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1618 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: यज्ञ-सम्बन्धी → यज्ञसम्बन्धी
  • #1619 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रवृत्ति-परक → प्रवृत्तिपरक

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