श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.47

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम्।

आवर्तेत२ प्रवृत्तेन निवृत्तेनाश्नुतेऽमृतम्॥ ४७

pravṛttaṃ ca nivṛttaṃ ca dvividhaṃ karma vaidikam|

āvarteta pravṛttena nivṛttenāśnute'mṛtam|| 47

अर्थ

वैदिक कर्म दो प्रकारके हैं—एक तो वे जो वृत्तियोंको उनके विषयोंकी ओर ले जाते हैं—प्रवृत्तिपरक और दूसरे वे जो वृत्तियोंको उनके विषयोंकी ओरसे लौटाकर शान्त एवं आत्म-साक्षात्कारके योग्य बना देते हैं—निवृत्तिपरक। प्रवृत्तिपरक कर्ममार्गसे बार-बार जन्म-मृत्युकी प्राप्ति होती है और निवृत्तिपरक भक्तिमार्ग या ज्ञानमार्गके द्वारा परमात्माकी प्राप्ति होती है॥ ४७॥✎ 1618 1619

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—आवर्तते।

    (मुद्रित पृष्ठ 899)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1618 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: यज्ञ-सम्बन्धी → यज्ञसम्बन्धी
  • #1619 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रवृत्ति-परक → प्रवृत्तिपरक

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