श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.18

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

सन्तुष्टः केन वा राजन्‍न वर्तेतापि वारिणा।

औपस्थ्यजैह्व्यकार्पण्याद् गृहपालायते जनः॥ १८✎ 2025

santuṣṭaḥ kena vā rājanna vartetāpi vāriṇā|

aupasthyajaihvyakārpaṇyād gṛhapālāyate janaḥ|| 18

अर्थ

युधिष्ठिर! न जाने क्यों मनुष्य केवल जलमात्रसे ही सन्तुष्ट रहकर अपने जीवनका निर्वाह नहीं कर लेता। अपितु रसनेन्द्रिय और जननेन्द्रियके फेरमें पड़कर यह बेचारा घरकी चौकसी करनेवाले कुत्तेके समान हो जाता है॥ १८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2025 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): स्थ्यजैह्वॺकार्प → स्थ्यजैह्व्यकार्प

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