॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.15.19
असन्तुष्टस्य विप्रस्य तेजो विद्या तपो यशः।
स्रवन्तीन्द्रियलौल्येन ज्ञानं चैवावकीर्यते॥ १९
asantuṣṭasya viprasya tejo vidyā tapo yaśaḥ|
sravantīndriyalaulyena jñānaṃ caivāvakīryate|| 19
अर्थ
जो ब्राह्मण सन्तोषी नहीं है, इन्द्रियोंकी लोलुपताके कारण उसके तेज, विद्या, तपस्या और यश क्षीण हो जाते हैं और वह विवेक भी खो बैठता है॥ १९॥