श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.17

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

सदा सन्तुष्टमनसः सर्वाः सुखमया१ दिशः।

शर्कराकण्टकादिभ्यो यथोपानत्पदः शिवम्॥ १७

sadā santuṣṭamanasaḥ sarvāḥ sukhamayā diśaḥ|

śarkarākaṇṭakādibhyo yathopānatpadaḥ śivam|| 17

अर्थ

जैसे पैरोंमें जूता पहनकर चलनेवालेको कंकड़ और काँटोंसे कोई डर नहीं होता—वैसे ही जिसके मनमें सन्तोष है, उसके लिये सर्वदा और सब कहीं सुख-ही-सुख है, दुःख है ही नहीं॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—शिवमया।

    (मुद्रित पृष्ठ 895)

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