॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.14.9
मृगोष्ट्रखरमर्काखुसरीसृप्खगमक्षिकाः ।
आत्मनः पुत्रवत् पश्येत्तैरेषामन्तरं कियत्॥ ९
mṛgoṣṭrakharamarkākhusarīsṛpkhagamakṣikāḥ |
ātmanaḥ putravat paśyettaireṣāmantaraṃ kiyat|| 9
अर्थ
हरिन, ऊँट, गधा, बंदर, चूहा, सरीसृप (रेंगकर चलनेवाले प्राणी), पक्षी और मक्खी आदिको अपने पुत्रके समान ही समझे। उनमें और पुत्रोंमें अन्तर ही कितना है॥ ९॥✎ 637