श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.9

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

मृगोष्ट्रखरमर्काखुसरीसृप्खगमक्षिकाः ।

आत्मनः पुत्रवत् पश्येत्तैरेषामन्तरं कियत्॥ ९

mṛgoṣṭrakharamarkākhusarīsṛpkhagamakṣikāḥ |

ātmanaḥ putravat paśyettaireṣāmantaraṃ kiyat|| 9

अर्थ

हरिन, ऊँट, गधा, बंदर, चूहा, सरीसृप (रेंगकर चलनेवाले प्राणी), पक्षी और मक्खी आदिको अपने पुत्रके समान ही समझे। उनमें और पुत्रोंमें अन्तर ही कितना है॥ ९॥✎ 637

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #637 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर

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