॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.14.8
यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति॥ ८
yāvad bhriyeta jaṭharaṃ tāvat svatvaṃ hi dehinām|
adhikaṃ yo'bhimanyeta sa steno daṇḍamarhati|| 8
अर्थ
मनुष्योंका अधिकार केवल उतने ही धनपर है, जितनेसे उनकी भूख मिट जाय। इससे अधिक सम्पत्तिको जो अपनी मानता है, वह चोर है, उसे दण्ड मिलना चाहिये॥ ८॥