॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.14.10
त्रिवर्गं नातिकृच्छ्रेण भजेत गृहमेध्यपि।
यथादेशं यथाकालं यावद्दैवोपपादितम्॥ १०
trivargaṃ nātikṛcchreṇa bhajeta gṛhamedhyapi|
yathādeśaṃ yathākālaṃ yāvaddaivopapāditam|| 10
अर्थ
गृहस्थ मनुष्योंको भी धर्म, अर्थ और कामके लिये बहुत कष्ट नहीं उठाना चाहिये; बल्कि देश, काल और प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय, उसीसे सन्तोष करना चाहिये॥ १०॥✎ 637