श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.10

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

त्रिवर्गं नातिकृच्छ्रेण भजेत गृहमेध्यपि।

यथादेशं यथाकालं यावद्दैवोपपादितम्॥ १०

trivargaṃ nātikṛcchreṇa bhajeta gṛhamedhyapi|

yathādeśaṃ yathākālaṃ yāvaddaivopapāditam|| 10

अर्थ

गृहस्थ मनुष्योंको भी धर्म, अर्थ और कामके लिये बहुत कष्ट नहीं उठाना चाहिये; बल्कि देश, काल और प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय, उसीसे सन्तोष करना चाहिये॥ १०॥✎ 637

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #637 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर

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