श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.41

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः।

तपसा विद्यया तुष्ट्या धत्ते वेदं हरेस्तनुम्॥ ४१

puruṣeṣvapi rājendra supātraṃ brāhmaṇaṃ viduḥ|

tapasā vidyayā tuṣṭyā dhatte vedaṃ harestanum|| 41

अर्थ

युधिष्ठिर! मनुष्योंमें भी ब्राह्मण विशेष सुपात्र माना गया है। क्योंकि वह अपनी तपस्या, विद्या और सन्तोष आदि गुणोंसे भगवान्‌के वेदरूप शरीरको धारण करता है॥ ४१॥✎ 643 644

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #643 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #644 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें