श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.40

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

ततोऽर्चायां हरिं केचित् संश्रद्धाय सपर्यया।

उपासत उपास्तापि नार्थदा पुरुषद्विषाम्॥ ४०

tato'rcāyāṃ hariṃ kecit saṃśraddhāya saparyayā|

upāsata upāstāpi nārthadā puruṣadviṣām|| 40

अर्थ

तभीसे कितने ही लोग बड़ी श्रद्धा और सामग्रीसे प्रतिमामें ही भगवान्‌की पूजा करते हैं। परन्तु जो मनुष्यसे द्वेष करते हैं, उन्हें प्रतिमाकी उपासना करनेपर भी सिद्धि नहीं मिल सकती॥ ४०॥✎ 643 644

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #643 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #644 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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