तभीसे कितने ही लोग बड़ी श्रद्धा और सामग्रीसे प्रतिमामें ही भगवान्की पूजा करते हैं। परन्तु जो मनुष्यसे द्वेष करते हैं, उन्हें प्रतिमाकी उपासना करनेपर भी सिद्धि नहीं मिल सकती॥ ४०॥✎ 643644
ततोऽर्चायां हरिं केचित् संश्रद्धाय सपर्यया।
उपासत उपास्तापि नार्थदा पुरुषद्विषाम्॥ ४०
तभीसे कितने ही लोग बड़ी श्रद्धा और सामग्रीसे प्रतिमामें ही भगवान्की पूजा करते हैं। परन्तु जो मनुष्यसे द्वेष करते हैं, उन्हें प्रतिमाकी उपासना करनेपर भी सिद्धि नहीं मिल सकती॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.14.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 893) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/14/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)