॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.13.32
राजतश्चोरतः शत्रोः स्वजनात्पशुपक्षितः।
अर्थिभ्यः कालतः स्वस्मान्नित्यं प्राणार्थवद्भयम्॥ ३२
rājataścorataḥ śatroḥ svajanātpaśupakṣitaḥ|
arthibhyaḥ kālataḥ svasmānnityaṃ prāṇārthavadbhayam|| 32
अर्थ
जो जीवन और धनके लोभी हैं—वे राजा, चोर, शत्रु, स्वजन, पशु-पक्षी, याचक और कालसे, यहाँतक कि ‘कहीं मैं भूल न कर बैठूँ, अधिक न खर्च कर दूँ’—इस आशंकासे अपने-आपसे भी सदा डरते रहते हैं॥ ३२॥✎ 1979