॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.13.33
शोकमोहभयक्रोधरागक्लैब्यश्रमादयः ।
यन्मूलाः स्युर्नृणां जह्यात् स्पृहां१ प्राणार्थयोर्बुधः॥ ३३
śokamohabhayakrodharāgaklaibyaśramādayaḥ |
yanmūlāḥ syurnṛṇāṃ jahyāt spṛhāṃ prāṇārthayorbudhaḥ|| 33
अर्थ
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जिसके कारण शोक, मोह, भय, क्रोध, राग, कायरता और श्रम आदिका शिकार होना पड़ता है—उस धन और जीवनकी स्पृहाका त्याग कर दे॥ ३३॥✎ 1979
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—स्पृहाः।