दत्तात्रेयजीने कहा—दैत्यराज! सभी श्रेष्ठ पुरुष तुम्हारा सम्मान करते हैं। मनुष्योंको कर्मोंकी प्रवृत्ति और उनकी निवृत्तिका क्या फल मिलता है, यह बात तुम अपनी ज्ञानदृष्टिसे जानते ही हो॥ २०॥
वेदेदमसुरश्रेष्ठ भवान् नन्वार्यसम्मतः।
ईहोपरमयोर्नॄणां पदान्यध्यात्मचक्षुषा॥ २०
दत्तात्रेयजीने कहा—दैत्यराज! सभी श्रेष्ठ पुरुष तुम्हारा सम्मान करते हैं। मनुष्योंको कर्मोंकी प्रवृत्ति और उनकी निवृत्तिका क्या फल मिलता है, यह बात तुम अपनी ज्ञानदृष्टिसे जानते ही हो॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 885) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/13/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1104 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ईहोपरमयोर्नृणां → ईहोपरमयोर्नॄणां