उनके उस बाणसे सूर्यमण्डलसे निकलनेवाली किरणोंके समान अन्य बहुत-से बाण निकले। उनमेंसे मानो आगकी लपटें निकल रही थीं। उनके कारण उन पुरोंका दीखना बंद हो गया॥ ५८॥
ततोऽग्निवर्णा इषव उत्पेतुः सूर्यमण्डलात्।
यथा मयूखसंदोहा नादृश्यन्त पुरो यतः॥ ५८
उनके उस बाणसे सूर्यमण्डलसे निकलनेवाली किरणोंके समान अन्य बहुत-से बाण निकले। उनमेंसे मानो आगकी लपटें निकल रही थीं। उनके कारण उन पुरोंका दीखना बंद हो गया॥ ५८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.58 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 873) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/58/