॥ श्रीहरिः ॥
अथानुगृह्य भगवान्मा भैष्टेति सुरान्विभुः।
शरं धनुषि सन्धाय पुरेष्वस्त्रं व्यमुञ्चत॥ ५७
athānugṛhya bhagavānmā bhaiṣṭeti surānvibhuḥ|
śaraṃ dhanuṣi sandhāya pureṣvastraṃ vyamuñcata|| 57
अर्थ
उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शंकरने कृपापूर्ण शब्दोंमें कहा—‘डरो मत।’ फिर उन्होंने अपने धनुषपर बाण चढ़ाकर तीनों पुरोंपर छोड़ दिया॥ ५७॥
अथानुगृह्य भगवान्मा भैष्टेति सुरान्विभुः।
शरं धनुषि सन्धाय पुरेष्वस्त्रं व्यमुञ्चत॥ ५७
उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शंकरने कृपापूर्ण शब्दोंमें कहा—‘डरो मत।’ फिर उन्होंने अपने धनुषपर बाण चढ़ाकर तीनों पुरोंपर छोड़ दिया॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 873) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/57/