॥ श्रीहरिः ॥
एकदा ब्रह्मणः पुत्रा विष्णोर्लोकं यदृच्छया।
सनन्दनादयो जग्मुश्चरन्तो भुवनत्रयम्॥ ३५
ekadā brahmaṇaḥ putrā viṣṇorlokaṃ yadṛcchayā|
sanandanādayo jagmuścaranto bhuvanatrayam|| 35
अर्थ
नारदजीने कहा—एक दिन ब्रह्माके मानसपुत्र सनकादि ऋषि तीनों लोकोंमें स्वच्छन्द विचरण करते हुए वैकुण्ठमें जा पहुँचे॥ ३५॥
एकदा ब्रह्मणः पुत्रा विष्णोर्लोकं यदृच्छया।
सनन्दनादयो जग्मुश्चरन्तो भुवनत्रयम्॥ ३५
नारदजीने कहा—एक दिन ब्रह्माके मानसपुत्र सनकादि ऋषि तीनों लोकोंमें स्वच्छन्द विचरण करते हुए वैकुण्ठमें जा पहुँचे॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 809) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/1/35/