फिर जो कुछ वृक्ष वहाँ बचे थे, उन्होंने डरकर ब्रह्माजीके कहनेसे वह कन्या लाकर प्रचेताओंको दी॥ ४७॥✎ 4244251349
तत्रावशिष्टा ये वृक्षा भीता दुहितरं तदा।
उज्जह्रुस्ते प्रचेतोभ्य उपदिष्टाः स्वयम्भुवा॥ ४७
फिर जो कुछ वृक्ष वहाँ बचे थे, उन्होंने डरकर ब्रह्माजीके कहनेसे वह कन्या लाकर प्रचेताओंको दी॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 569) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)