श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तत्र स्वसॄर्मे ननु भर्तृसम्मिता ✎ 1018

मातृष्वसॄः क्लिन्‍नधियं च मातरम्।✎ 1019

द्रक्ष्ये चिरोत्कण्ठमना महर्षिभि-

रुन्‍नीयमानं च मृडाध्वरध्वजम्॥ १०

tatra svasṝrme nanu bhartṛsammitā

mātṛṣvasṝḥ klinnadhiyaṃ ca mātaram|

drakṣye cirotkaṇṭhamanā maharṣibhi-

runnīyamānaṃ ca mṛḍādhvaradhvajam|| 10

अर्थ

वहाँ अपने पतियोंसे सम्मानित बहिनों, मौसियों और स्नेहार्द्रहृदया जननीको देखनेके लिये मेरा मन बहुत दिनोंसे उत्सुक है। कल्याणमय! इसके सिवा वहाँ महर्षियोंका रचा हुआ श्रेष्ठ यज्ञ भी देखनेको मिलेगा॥ १०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1018 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्वसृर्मे → स्वसॄर्मे
  • #1019 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मातृष्वसृ: → मातृष्वसॄः

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