श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

त्वय्येतदाश्‍चर्यमजात्ममायया

विनिर्मितं भाति गुणत्रयात्मकम्।

तथाप्यहं योषिदतत्त्वविच्च ते

दीना दिदृक्षे भव मे भवक्षितिम्॥ ११

tvayyetadāścaryamajātmamāyayā

vinirmitaṃ bhāti guṇatrayātmakam|

tathāpyahaṃ yoṣidatattvavicca te

dīnā didṛkṣe bhava me bhavakṣitim|| 11

अर्थ

अजन्मा प्रभो! आप जगत‍्की उत्पत्तिके हेतु हैं। आपकी मायासे रचा हुआ यह परम आश्‍चर्यमय त्रिगुणात्मक जगत् आपहीमें भास रहा है। किंतु मैं तो स्त्रीस्वभाव होनेके कारण आपके तत्त्वसे अनभिज्ञ और बहुत दीन हूँ। इसलिये इस समय अपनी जन्मभूमि देखनेको बहुत उत्सुक हो रही हूँ॥ ११॥

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