श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुणः।

शेते कामलवान्ध्यायन्ममाहमिति कर्मकृत्॥ २५

prāṇendriyamanodharmānātmanyadhyasya nirguṇaḥ|

śete kāmalavāndhyāyanmamāhamiti karmakṛt|| 25

अर्थ

वस्तुतः तो वह निर्गुण है, किन्तु प्राण, इन्द्रिय और मनके धर्मोंको अपनेमें आरोपित कर मैं-मेरेपनके अभिमानसे बँधकर क्षुद्र विषयोंका चिन्तन करता हुआ तरह-तरहके कर्म करता रहता है॥ २५॥✎ 1345 1346 1347

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
  • #1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
  • #1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें

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