श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.24

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

एवं बहुविधैर्दुःखैर्दैवभूतात्मसम्भवैः।

क्लिश्यमानः शतं वर्षं देहे देही तमोवृतः॥ २४

evaṃ bahuvidhairduḥkhairdaivabhūtātmasambhavaiḥ|

kliśyamānaḥ śataṃ varṣaṃ dehe dehī tamovṛtaḥ|| 24

अर्थ

इस प्रकार यह देहाभिमानी जीव अज्ञानसे आच्छादित होकर अनेक प्रकारके आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक कष्ट भोगता हुआ सौ वर्षतक मनुष्यशरीरमें पड़ा रहता है॥ २४॥✎ 1345 1346 1347

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
  • #1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
  • #1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें

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