यह यद्यपि स्वयंप्रकाश है, तथापि जबतक सबके परमगुरु आत्मस्वरूप श्रीभगवान्के स्वरूपको नहीं जानता, तबतक प्रकृतिके गुणोंमें ही बँधा रहता है॥ २६॥✎ 134513461347
यदाऽऽत्मानमविज्ञाय भगवन्तं परं गुरुम्।
पुरुषस्तु विषज्जेत गुणेषु प्रकृतेः स्वदृक्॥ २६
यह यद्यपि स्वयंप्रकाश है, तथापि जबतक सबके परमगुरु आत्मस्वरूप श्रीभगवान्के स्वरूपको नहीं जानता, तबतक प्रकृतिके गुणोंमें ही बँधा रहता है॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 556) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
#1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
#1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें