श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.47

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

खद्योताऽऽविर्मुखी च प्राग्द्वारावेकत्र निर्मिते।

विभ्राजितं जनपदं याति ताभ्यां द्युमत्सखः॥ ४७

khadyotā''virmukhī ca prāgdvārāvekatra nirmite|

vibhrājitaṃ janapadaṃ yāti tābhyāṃ dyumatsakhaḥ|| 47

अर्थ

पूर्वकी ओर खद्योता और आविर्मुखी नामके दो द्वार एक ही जगह बनाये गये थे। उनमें होकर राजा पुरंजन अपने मित्र द्युमान्के साथ विभ्राजित नामक देशको जाया करता था॥ ४७॥✎ 1338 1339

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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