श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.48

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

नलिनी नालिनी च प्राग्द्वारावेकत्र निर्मिते।

अवधूतसखस्ताभ्यां विषयं याति सौरभम्॥ ४८

nalinī nālinī ca prāgdvārāvekatra nirmite|

avadhūtasakhastābhyāṃ viṣayaṃ yāti saurabham|| 48

अर्थ

इसी प्रकार उस ओर नलिनी और नालिनी नामके दो द्वार और भी एक ही जगह बनाये गये थे। उनसे होकर वह अवधूतके साथ सौरभ नामक देशको जाता था॥ ४८॥✎ 1338 1339

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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