उस नगरमें जो नौ द्वार थे, उनमेंसे सात नगरीके ऊपर और दो नीचे थे। उस नगरका जो कोई राजा होता, उसके पृथक्-पृथक् देशोंमें जानेके लिये ये द्वार बनाये गये थे॥ ४५॥✎ 13381339
सप्तोपरि कृता द्वारः पुरस्तस्यास्तु द्वे अधः।
पृथग्विषयगत्यर्थं तस्यां यः कश्चनेश्वरः॥ ४५
उस नगरमें जो नौ द्वार थे, उनमेंसे सात नगरीके ऊपर और दो नीचे थे। उस नगरका जो कोई राजा होता, उसके पृथक्-पृथक् देशोंमें जानेके लिये ये द्वार बनाये गये थे॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/45/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति