गायक लोग सुमधुर स्वरमें जहाँ-तहाँ राजा पुरंजनकी कीर्ति गाया करते थे। जब ग्रीष्म-ऋतु आती, तब वह अनेकों स्त्रियोंके साथ सरोवरमें घुसकर जलक्रीड़ा करता॥ ४४॥✎ 13381339
उपगीयमानो ललितं तत्र तत्र च गायकैः।
क्रीडन् परिवृतः स्त्रीभिर्ह्रदिनीमाविशच्छुचौ॥ ४४
गायक लोग सुमधुर स्वरमें जहाँ-तहाँ राजा पुरंजनकी कीर्ति गाया करते थे। जब ग्रीष्म-ऋतु आती, तब वह अनेकों स्त्रियोंके साथ सरोवरमें घुसकर जलक्रीड़ा करता॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति