श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

इहाद्य सन्तमात्मानं विदाम न ततः परम्।

येनेयं निर्मिता वीर पुरी शरणमात्मनः॥ ३४

ihādya santamātmānaṃ vidāma na tataḥ param|

yeneyaṃ nirmitā vīra purī śaraṇamātmanaḥ|| 34

अर्थ

वीरवर! आज हम सब इस पुरीमें हैं—इसके सिवा मैं और कुछ नहीं जानती; मुझे इसका भी पता नहीं है कि हमारे रहनेके लिये यह पुरी किसने बनायी है॥ ३४॥✎ 1336 1337

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1336 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): गृह-स्थाश्रममें → गृहस्थाश्रममें
  • #1337 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विषय-भोगों-की → विषय-भोगोंकी

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