वह कहने लगी, ‘नरश्रेष्ठ! हमें अपने उत्पन्न करनेवालेका ठीक-ठीक पता नहीं है और न हम अपने या किसी दूसरेके नाम या गोत्रको ही जानती हैं॥ ३३॥✎ 13361337
न विदाम वयं सम्यक्कर्तारं पुरुषर्षभ।
आत्मनश्च परस्यापि गोत्रं नाम च यत्कृतम्॥ ३३
वह कहने लगी, ‘नरश्रेष्ठ! हमें अपने उत्पन्न करनेवालेका ठीक-ठीक पता नहीं है और न हम अपने या किसी दूसरेके नाम या गोत्रको ही जानती हैं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 537) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/25/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
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