श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.61

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव।

वात्सल्ये मनुवन्‍नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः॥ ६१ ✎ 1032

kandarpa iva saundarye manasvī mṛgarāḍiva|

vātsalye manuvannṝṇāṃ prabhutve bhagavānajaḥ|| 61

अर्थ

सौन्दर्यमें कामदेवके समान, उत्साहमें सिंहके समान, वात्सल्यमें मनुके समान और मनुष्योंके आधिपत्यमें सर्वसमर्थ ब्रह्माजीके समान थे॥ ६१॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1032 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुवन्‍नृणां → मनुवन्‍नॄणां

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