॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.22.62
बृहस्पतिर्ब्रह्मवादे आत्मवत्त्वे स्वयं हरिः।
भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु।
ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यः परोद्यमे॥ ६२
bṛhaspatirbrahmavāde ātmavattve svayaṃ hariḥ|
bhaktyā goguruvipreṣu viṣvaksenānuvartiṣu|
hriyā praśrayaśīlābhyāmātmatulyaḥ parodyame|| 62
अर्थ
ब्रह्मविचारमें बृहस्पति, इन्द्रियजयमें साक्षात् श्रीहरि तथा गौ, ब्राह्मण, गुरुजन एवं भगवद्भक्तोंकी भक्ति, लज्जा, विनय, शील एवं परोपकार आदि गुणोंमें अपने ही समान (अनुपम) थे॥ ६२॥