इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद्भुवः॥ २७
asti yajñapatirnāma keṣāñcidarhasattamāḥ|
ihāmutra ca lakṣyante jyotsnāvatyaḥ kvacidbhuvaḥ|| 27
अर्थ
माननीय सज्जनो! किन्हीं श्रेष्ठ महानुभावोंके मतमें तो कर्मोंका फल देनेवाले भगवान् यज्ञपति ही हैं; क्योंकि इहलोक और परलोक दोनों ही जगह कोई-कोई शरीर बड़े तेजोमय देखे जाते हैं॥ २७॥✎ 408
अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्चिदर्हसत्तमाः।
इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद्भुवः॥ २७
माननीय सज्जनो! किन्हीं श्रेष्ठ महानुभावोंके मतमें तो कर्मोंका फल देनेवाले भगवान् यज्ञपति ही हैं; क्योंकि इहलोक और परलोक दोनों ही जगह कोई-कोई शरीर बड़े तेजोमय देखे जाते हैं॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 508) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)