श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्चिदर्हसत्तमाः।✎ 1031

इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्‍वचिद्भुवः॥ २७

asti yajñapatirnāma keṣāñcidarhasattamāḥ|

ihāmutra ca lakṣyante jyotsnāvatyaḥ kvacidbhuvaḥ|| 27

अर्थ

माननीय सज्जनो! किन्हीं श्रेष्ठ महानुभावोंके मतमें तो कर्मोंका फल देनेवाले भगवान् यज्ञपति ही हैं; क्योंकि इहलोक और परलोक दोनों ही जगह कोई-कोई शरीर बड़े तेजोमय देखे जाते हैं॥ २७॥✎ 408

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #408 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #1031 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): केषांञ्च‌िदर्हसत्तमा:। → केषाञ्चिदर्हसत्तमाः।

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