श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

यूयं तदनुमोदध्वं पितृदेवर्षयोऽमलाः।

कर्तुः शास्तुरनुज्ञातुस्तुल्यं यत्प्रेत्य तत्फलम्॥ २६

yūyaṃ tadanumodadhvaṃ pitṛdevarṣayo'malāḥ|

kartuḥ śāsturanujñātustulyaṃ yatpretya tatphalam|| 26

अर्थ

विशुद्धचित्त देवता, पितर और महर्षिगण! आप भी मेरी इस प्रार्थनाका अनुमोदन कीजिये; क्योंकि कोई भी कर्म हो, मरनेके अनन्तर उसके कर्ता, उपदेष्टा और समर्थकको उसका समान फल मिलता है॥ २६॥✎ 408

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #408 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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