श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

मनोरुत्तानपादस्य ध्रुवस्यापि महीपतेः।

प्रियव्रतस्य राजर्षेरंगस्यास्मत्पितुः पितुः॥ २८

manoruttānapādasya dhruvasyāpi mahīpateḥ|

priyavratasya rājarṣeraṃgasyāsmatpituḥ pituḥ|| 28

अर्थ

मनु, उत्तानपाद, महीपति ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत, हमारे दादा अंग तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और इसी कोटिके अन्यान्य महानुभावोंके मतमें तो धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्ग तथा स्वर्ग और अपवर्गके स्वाधीन नियामक, कर्मफलदातारूपसे भगवान् गदाधरकी आवश्यकता है ही। इस विषयमें तो केवल मृत्युके दौहित्र वेन आदि कुछ शोचनीय और धर्मविमूढ़ लोगोंका ही मतभेद है। अतः उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता॥ २८—३०॥✎ 408

यह अर्थ श्लोक 28–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #408 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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