श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

व्यूढवक्षा बृहच्छ्रोणिर्वलिवल्गुदलोदरः।

आवर्तनाभिरोजस्वी कांचनोरुरुदग्रपात्॥ १६

vyūḍhavakṣā bṛhacchroṇirvalivalgudalodaraḥ|

āvartanābhirojasvī kāṃcanorurudagrapāt|| 16

अर्थ

उनकी छाती चौड़ी, कमरका पिछला भाग स्थूल और उदर पीपलके पत्तेके समान सुडौल तथा बल पड़े हुए होनेसे और भी सुन्दर जान पड़ता था। नाभि भँवरके समान गम्भीर थी, शरीर तेजस्वी था, जंघाएँ सुवर्णके समान देदीप्यमान थीं तथा पैरोंके पंजे उभरे हुए थे॥ १६॥✎ 1332

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें

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