श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

सूक्ष्मवक्रासितस्निग्धमूर्धजः कम्बुकन्धरः।

महाधने दुकूलाग्र्ये परिधायोपवीय च॥ १७

sūkṣmavakrāsitasnigdhamūrdhajaḥ kambukandharaḥ|

mahādhane dukūlāgrye paridhāyopavīya ca|| 17

अर्थ

उनके बाल बारीक, घुँघराले, काले और चिकने थे; गरदन शंखके समान उतार-चढ़ाववाली तथा रेखाओंसे युक्त थी और वे उत्तम बहुमूल्य धोती पहने और वैसी ही चादर ओढ़े थे॥ १७॥✎ 1332

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें

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