श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

लोकस्य मिथ्याभिमतेरचक्षुष-

श्चिरं प्रसुप्तस्य तमस्यनाश्रये।

श्रान्तस्य कर्मस्वनुविद्धया धिया

त्वमाविरासीः किल योगभास्करः॥ ५

lokasya mithyābhimateracakṣuṣa-

ściraṃ prasuptasya tamasyanāśraye|

śrāntasya karmasvanuviddhayā dhiyā

tvamāvirāsīḥ kila yogabhāskaraḥ|| 5

अर्थ

ज्ञानदृष्टिके लुप्त हो जानेके कारण देहादि मिथ्या वस्तुओंमें जिन्हें आत्माभिमान हो गया है तथा बुद्धिके कर्मासक्त रहनेके कारण अत्यन्त श्रमित होकर जो चिरकालसे अपार अन्धकारमय संसारमें सोये पड़े हैं, उन्हें जगानेके लिये आप योगप्रकाशक सूर्य ही प्रकट हुए हैं॥ ५॥✎ 1312 1995

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1312 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ज्ञान-दृष्टिके → ज्ञानदृष्टिके
  • #1995 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): श्रमिक → श्रमित

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