श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

कालस्येश्‍वररूपस्य परेषां च परस्य ते।

स्वरूपं बत कुर्वन्ति यद्धेतोः कुशलं जनाः॥ ४

kālasyeśvararūpasya pareṣāṃ ca parasya te|

svarūpaṃ bata kurvanti yaddhetoḥ kuśalaṃ janāḥ|| 4

अर्थ

जिसके भयसे लोग शुभ कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं और जो ब्रह्मादिका भी शासन करनेवाला है, उस सर्वसमर्थ कालका स्वरूप भी आप मुझसे कहिये॥ ४॥✎ 1312 1995

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1312 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ज्ञान-दृष्टिके → ज्ञानदृष्टिके
  • #1995 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): श्रमिक → श्रमित

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें