श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

इति मातुर्वचः श्लक्ष्णं प्रतिनन्द्य महामुनिः।

आबभाषे कुरुश्रेष्ठ प्रीतस्तां करुणार्दितः॥ ६

iti māturvacaḥ ślakṣṇaṃ pratinandya mahāmuniḥ|

ābabhāṣe kuruśreṣṭha prītastāṃ karuṇārditaḥ|| 6

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—कुरुश्रेष्ठ विदुरजी! माताके ये मनोहर वचन सुनकर महामुनि कपिलजीने उनकी प्रशंसा की और जीवोंके प्रति दयासे द्रवीभूत हो बड़ी प्रसन्‍नताके साथ उनसे इस प्रकार बोले—॥ ६॥

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