मेरे इन सेवकोंने मेरा अभिप्राय न समझकर ही आपलोगोंका अपमान किया है। इसलिये मेरे अनुरोधसे आप केवल इतनी कृपा कीजिये कि इनका यह निर्वासनकाल शीघ्र ही समाप्त हो जाय, ये अपने अपराधके अनुरूप अधम गतिको भोगकर शीघ्र ही मेरे पास लौट आयें॥ १२॥✎ 1309
तन्मे स्वभर्तुरवसायमलक्षमाणौ
युष्मद्व्यतिक्रमगतिं प्रतिपद्य सद्यः।
भूयो ममान्तिकमितां तदनुग्रहो मे
यत्कल्पतामचिरतो भृतयोर्विवासः॥ १२
मेरे इन सेवकोंने मेरा अभिप्राय न समझकर ही आपलोगोंका अपमान किया है। इसलिये मेरे अनुरोधसे आप केवल इतनी कृपा कीजिये कि इनका यह निर्वासनकाल शीघ्र ही समाप्त हो जाय, ये अपने अपराधके अनुरूप अधम गतिको भोगकर शीघ्र ही मेरे पास लौट आयें॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.16.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 314) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/16/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1309 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रसन्न-चित्तसे → प्रसन्नचित्तसे