श्रीब्रह्माजी कहते हैं—देवताओ! सनकादि मुनि क्रोधरूप सर्पसे डसे हुए थे, तो भी उनका चित्त अन्तःकरणको प्रकाशित करनेवाली भगवान्की मन्त्रमयी सुमधुर वाणी सुनते-सुनते तृप्त नहीं हुआ॥ १३॥✎ 266
अथ तस्योशतीं देवीमृषिकुल्यां सरस्वतीम्।
नास्वाद्य मन्युदष्टानां तेषामात्माप्यतृप्यत॥ १३
श्रीब्रह्माजी कहते हैं—देवताओ! सनकादि मुनि क्रोधरूप सर्पसे डसे हुए थे, तो भी उनका चित्त अन्तःकरणको प्रकाशित करनेवाली भगवान्की मन्त्रमयी सुमधुर वाणी सुनते-सुनते तृप्त नहीं हुआ॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.16.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 314) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/16/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)