श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

ये ब्राह्मणान्मयि धिया क्षिपतोऽर्चयन्त-

स्तुष्यद‍्धृदः स्मितसुधोक्षितपद्मवक्‍त्राः।

वाण्यानुरागकलयाऽऽत्मजवद् गृणन्तः

सम्बोधयन्त्यहमिवाहमुपाहृतस्तैः॥ ११

ye brāhmaṇānmayi dhiyā kṣipato'rcayanta-

stuṣyaddhṛdaḥ smitasudhokṣitapadmavaktrāḥ|

vāṇyānurāgakalayā''tmajavad gṛṇantaḥ

sambodhayantyahamivāhamupāhṛtastaiḥ|| 11

अर्थ

ब्राह्मण तिरस्कारपूर्वक कटुभाषण भी करे, तो भी जो उसमें मेरी भावना करके प्रसन्‍नचित्तसे तथा अमृतभरी मुसकानसे युक्त मुखकमलसे उसका आदर करते हैं तथा जैसे रूठे हुए पिताको पुत्र और आपलोगोंको मैं मनाता हूँ, उसी प्रकार जो प्रेमपूर्ण वचनोंसे प्रार्थना करते हुए उन्हें शान्त करते हैं, वे मुझे अपने वशमें कर लेते हैं॥ ११॥✎ 1309

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1309 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रसन्‍न-चित्तसे → प्रसन्‍नचित्तसे

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