श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.45

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

प्राधान्यतो यानृष आमनन्ति

लीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः।

आपीयतां कर्णकषायशोषा-

ननुक्रमिष्ये त इमान् सुपेशान्॥ ४५

prādhānyato yānṛṣa āmananti

līlāvatārān puruṣasya bhūmnaḥ|

āpīyatāṃ karṇakaṣāyaśoṣā-

nanukramiṣye ta imān supeśān|| 45

अर्थ

नारद! इनके सिवा परम पुरुष परमात्माके परम पवित्र एवं प्रधान-प्रधान लीलावतार भी शास्त्रोंमें वर्णित हैं। उनका मैं क्रमशः वर्णन करता हूँ। उनके चरित्र सुननेमें बड़े मधुर एवं श्रवणेन्द्रियके दोषोंको दूर करनेवाले हैं। तुम सावधान होकर उनका रस लो॥ ४५॥✎ 1292 1952

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1292 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अनन्त-भगवान्‌के → अनन्तभगवान्‌के
  • #1952 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): भगवत्त्वरूप → भगवत्स्वरूप

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