ब्रह्माजी कहते हैं—अनन्तभगवान्ने प्रलयके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये समस्त यज्ञमय वराहशरीर ग्रहण किया था। आदिदैत्य हिरण्याक्ष जलके अंदर ही लड़नेके लिये उनके सामने आया। जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे पर्वतोंके पंख काट डाले थे, वैसे ही वराहभगवान्ने अपनी दाढ़ोंसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये॥ १॥✎ 143144
यत्रोद्यतः क्षितितलोद्धरणाय बिभ्रत्
क्रौडीं तनुं सकलयज्ञमयीमनन्तः।
अन्तर्महार्णव उपागतमादिदैत्यं
तं दंष्ट्रयाद्रिमिव वज्रधरो ददार॥ १
ब्रह्माजी कहते हैं—अनन्तभगवान्ने प्रलयके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये समस्त यज्ञमय वराहशरीर ग्रहण किया था। आदिदैत्य हिरण्याक्ष जलके अंदर ही लड़नेके लिये उनके सामने आया। जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे पर्वतोंके पंख काट डाले थे, वैसे ही वराहभगवान्ने अपनी दाढ़ोंसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.7.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 208) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/7/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#143 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् ने → वराहभगवान्ने
#144 शब्दोंके बीचका स्थान: अनन्तभगवान् ने → अनन्तभगवान्ने