श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.44

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यत्किञ्च लोके भगवन्महस्व-

दोजःसहस्वद् बलवत् क्षमावत्।

श्रीह्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं

तत्त्वं परं रूपवदस्वरूपम्॥ ४४

yatkiñca loke bhagavanmahasva-

dojaḥsahasvad balavat kṣamāvat|

śrīhrīvibhūtyātmavadadbhutārṇaṃ

tattvaṃ paraṃ rūpavadasvarūpam|| 44

अर्थ

मैं, शंकर, विष्णु, दक्ष आदि ये प्रजापति, तुम और तुम्हारे-जैसे अन्य भक्तजन, स्वर्गलोकके रक्षक, पक्षियोंके राजा, मनुष्यलोकके राजा, नीचेके लोकोंके राजा; गन्धर्व, विद्याधर और चारणोंके अधिनायक; यक्ष, राक्षस, साँप और नागोंके स्वामी; महर्षि, पितृपति, दैत्येन्द्र, सिद्धेश्‍वर, दानवराज; और भी प्रेत-पिशाच, भूत-कूष्माण्ड, जल-जन्तु, मृग और पक्षियोंके स्वामी; एवं संसारमें और भी जितनी वस्तुएँ ऐश्‍वर्य, तेज, इन्द्रियबल, मनोबल, शरीरबल या क्षमासे युक्त हैं; अथवा जो भी विशेष सौन्दर्य, लज्जा, वैभव तथा विभूतिसे युक्त हैं; एवं जितनी भी वस्तुएँ अद्भुत वर्णवाली, रूपवान् या अरूप हैं—वे सब-के-सब परमतत्त्वमय भगवत्स्वरूप ही हैं॥ ४२—४४॥✎ 1292 1952

यह अर्थ श्लोक 42–44 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1292 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अनन्त-भगवान्‌के → अनन्तभगवान्‌के
  • #1952 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): भगवत्त्वरूप → भगवत्स्वरूप

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