श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.10

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अव्यक्तरससिन्धूनां भूतानां निधनस्य च।

उदरं विदितं पुंसो हृदयं मनसः पदम्॥ १०

avyaktarasasindhūnāṃ bhūtānāṃ nidhanasya ca|

udaraṃ viditaṃ puṃso hṛdayaṃ manasaḥ padam|| 10

अर्थ

उनके उदरमें मूल प्रकृति, रस नामकी धातु तथा समुद्र, समस्त प्राणी और उनकी मृत्यु समायी हुई है। उनका हृदय ही मनकी जन्मभूमि है॥ १०॥✎ 1290 1291

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1290 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
  • #1291 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,

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