॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.3.12
ज्ञानं यदा प्रतिनिवृत्तगुणोर्मिचक्र-
मात्मप्रसाद उत यत्र गुणेष्वसङ्गः।
कैवल्यसम्मतपथस्त्वथ भक्तियोगः
को निर्वृतो हरिकथासु रतिं न कुर्यात्॥ १२
jñānaṃ yadā pratinivṛttaguṇormicakra-
mātmaprasāda uta yatra guṇeṣvasaṅgaḥ|
kaivalyasammatapathastvatha bhaktiyogaḥ
ko nirvṛto harikathāsu ratiṃ na kuryāt|| 12
अर्थ
ऐसे पुरुषोंके सत्संगमें जो भगवान्की लीला-कथाएँ होती हैं, उनसे उस दुर्लभ ज्ञानकी प्राप्ति होती है जिससे संसार-सागरकी त्रिगुणमयी तरंगमालाओंके थपेड़े शान्त हो जाते हैं, हृदय शुद्ध होकर आनन्दका अनुभव होने लगता है, इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति नहीं रहती, कैवल्यमोक्षका सर्वसम्मत मार्ग भक्तियोग प्राप्त हो जाता है। भगवान्की ऐसी रसमयी कथाओंका चस्का लग जानेपर भला कौन ऐसा है, जो उनमें प्रेम न करे॥ १२॥✎ 122 123 124 125 126 1286 1287 1288