शौनकजीने कहा—सूतजी! राजा परीक्षित्ने शुकदेवजीकी यह बात सुनकर उनसे और क्या पूछा? वे तो सर्वज्ञ होनेके साथ-ही-साथ मधुर वर्णन करनेमें भी बड़े निपुण थे॥ १३॥
इत्यभिव्याहृतं राजा निशम्य भरतर्षभः।
किमन्यत्पृष्टवान् भूयो वैयासकिमृषिं कविम्॥ १३
शौनकजीने कहा—सूतजी! राजा परीक्षित्ने शुकदेवजीकी यह बात सुनकर उनसे और क्या पूछा? वे तो सर्वज्ञ होनेके साथ-ही-साथ मधुर वर्णन करनेमें भी बड़े निपुण थे॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.3.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 193) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/13/