श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.3.14

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

एतच्छुश्रूषतां विद्वन् सूत नोऽर्हसि भाषितुम्।

कथा हरिकथोदर्काः सतां स्युः सदसि ध्रुवम्॥ १४

etacchuśrūṣatāṃ vidvan sūta no'rhasi bhāṣitum|

kathā harikathodarkāḥ satāṃ syuḥ sadasi dhruvam|| 14

अर्थ

सूतजी! आप तो सब कुछ जानते हैं, हमलोग उनकी वह बातचीत बड़े प्रेमसे सुनना चाहते हैं, आप कृपा करके अवश्य सुनाइये। क्योंकि संतोंकी सभामें ऐसी ही बातें होती हैं जिनका पर्यवसान भगवान्‌की रसमयी लीला-कथामें ही होता है॥ १४॥✎ 127 128

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #127 शब्दोंके बीचका स्थान: है।ये → है। ये
  • #128 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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