जितने भी उपासक हैं, उनका सबसे बड़ा हित इसीमें है कि वे भगवान्के प्रेमी भक्तोंका संग करके भगवान्में अविचल प्रेम प्राप्त कर लें॥ ११॥✎ 122123124125126128612871288
एतावानेव यजतामिह निःश्रेयसोदयः।
भगवत्यचलो भावो यद् भागवतसङ्गतः॥ ११
जितने भी उपासक हैं, उनका सबसे बड़ा हित इसीमें है कि वे भगवान्के प्रेमी भक्तोंका संग करके भगवान्में अविचल प्रेम प्राप्त कर लें॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.3.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 193) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (8)