नेत्रोंके कोने कमलके भीतरी भागके समान तनिक लाल-लाल थे। मुसकान और चितवन बरबस हृदयको पकड़ लेती थी। बड़ी गम्भीर नाभि थी। छोटी-सी तोंद पीपलके पत्तेके समान जान पड़ती और श्वास लेनेके समय उसपर पड़ी हुई बलें तथा नाभि भी हिल जाया करती थी॥ २४॥
पद्मगर्भारुणापांगं हृद्यहासावलोकनम्।
श्वासैजद्वलिसंविग्ननिम्ननाभिदलोदरम्॥ २४
नेत्रोंके कोने कमलके भीतरी भागके समान तनिक लाल-लाल थे। मुसकान और चितवन बरबस हृदयको पकड़ लेती थी। बड़ी गम्भीर नाभि थी। छोटी-सी तोंद पीपलके पत्तेके समान जान पड़ती और श्वास लेनेके समय उसपर पड़ी हुई बलें तथा नाभि भी हिल जाया करती थी॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.9.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 956) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/9/24/